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वो तो बस माँ थी

Posted On: 13 May, 2012 Others में

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वो तो बस माँ थी
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वो तो बस माँ थी जो सहम जाती थी मेरे रोने से
जिसे ,खुशबु आती थी मेरे गीले बिछोने से
मुझे वजूद मिला ‘वो ‘कहती है उस रब्ब से
मुझे पता है मै हूँ तो सिर्फ माँ के होने से
मेरी हर हार पे रोई है मुझी से छुपकर माँ
मेरी हर “जीत” है बस इस डर के होने से
रो देती है जीत जाने पर मुझ से लिपट कर माँ
वार दूँ जन्नत भी मै उसके यूँ रोने पे
आज भी जब रुक जाती है राह एक कोई
निकलती हैं नई राहें उसके आँचल के एक कोने से
वो तो बस माँ है जो सहम जाती थी मेरे रोने से
जिसे ,खुशबु आती थी मेरे गीले बिछोने से

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
May 16, 2012

जीत जी नमस्कार, माँ से आपका प्यार लगाव आसानी से महसूस किया जा सकता है. बहुत सुन्दर रचना. बधाई.

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 15, 2012

मलकीत सिंह जी- माँ के बारे में बहुत ही सुन्दर भावाव्यक्ति…………..बधाई ले………………….. मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है……………………………………… http://www.hnif.jagranjunction.com

dineshaastik के द्वारा
May 14, 2012

माँ केवल  माँ नहीं है, मेरा खुदा है, मंदिर का खुदा,मेरी माँ से कब जुदा है।


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