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देवी तो नहीं है मेरी माँ

Posted On 7 May, 2012 में

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mother1 okमाँ

देवी तो नहीं है मेरी माँ

कहूँगा भी नहीं

और न ही हो

सुना है रूठ जाती हैं देवियाँ

जरा जरा सी बात पर ,

पर माँ तो  नहीं रूठती

कभी नहीं

परी भी नहीं है मेरी माँ

नहीं देखा उनका देश

न रूप माँ की तरह

जो हमेंशा  है मेरे साथ

नहीं दूर  होती एक पल भी

कभी नहीं

हाँ सोचता हूँ कभी -कभी

कह दूँ भगवान का रूप

पर नहीं ,उसे भी तो नहीं देखा

किसी भी रूप में

हाँ मगर वो कहीं होगा तो

शायद माँ के ही रूप में

जब चला हूँ पथरीली राह

यां नंगे पाँव तपती दोपहर में

पाई है माँ की हथेलिया हमेशा

अपने पैरो व् उस जमीन के बीच

बचपन से सुनता आया हूँ

माँ देवी का रूप है ,

माँ परी है भागवान  की छाया है ,लेकिन

सब कुछ है इसके उलट

हाँ देविया हो सकती है माँ का एक रूप

भागवान भी होगा तो माँ की छाया सा ही

क्योंकि छाया तो अक्सर अँधेरे में

छोड़ देती है तनहा -अकेला

माँ नहीं कही भी नहीं

कभी नहीं

क्योकि देवी तो नहीं है मेरी माँ

जो रूठ जायेगी

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 13, 2012

वाह वाह … बिलकुल सही … सुंदर और सच्चा भाव

dineshaastik के द्वारा
May 8, 2012

मलकीत जी बहुत ही सुन्दर भाव, इससे आगे कहना चाहूँगा- खुदा क्या है नहीं जानता, मैं तो अपनी माँ को ही खुदा मानता। मुझे अपनी माँ से खुदा छोटा लगता है। माँ तो मिल  जाती है, लेकिन खुदा कहीं नहीं दिखता।

jlsingh के द्वारा
April 29, 2012

हमने कभी उसको नहीं देखा पर उसकी जरूरत क्या होगी ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी !!! बिलकुल वही भाव आपने अपनी कविता में रख दी है माँ की तुलना किसी से नहीं कई जा सकती! बहुत ही सुन्दर भाव को दर्शाती आपकी रचना!

alkargupta1 के द्वारा
April 27, 2012

मलकीत सिंह जी , वात्सल्यमयी माँ अतुलनीय है… अवर्णनीय है…..अकथनीय है…… अति सुन्दर यथार्थ भावाभिव्यक्ति !

April 27, 2012

बहुत खूब जनाब, किसी ने क्या खूब कहा भी है खुदा तो नहीं पर खुदा जैसी है मेरी माँ……..आपकी मन के भावों को सलाम करता हूँ और जिनको अपनी माँ से शिकायत है इस भाव को उन्हें समर्पित करता हूँ…

rekhafbd के द्वारा
April 27, 2012

मलकीत जी” ,उसको नहीं देखा हमने कभी ,पर उसकी जरूरत क्या होगी ,ऐ माँ ते सूरतसे अलग ….”माँ के प्रति आपका प्रेम सराहनीय है .माँ होती ही ऐसी है ,नमन |

चन्दन राय के द्वारा
April 27, 2012

जीत साहब , आपके माँ के प्रति प्रेम और शब्दों से दिया अर्पण दोनों को मेरा नमन

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
April 27, 2012

भागवान भी होगा तो माँ की छाया सा ही क्योंकि छाया तो अक्सर अँधेरे में छोड़ देती है तनहा -अकेला माँ नहीं कही भी नहीं प्रिय मलकीत जी बहुत सुन्दर माँ अतुलनीय है उस की तुलना किसी से कर नहीं सकते प्रेम की बदरी सींच सींच हरा भरा कर जीवन देने वाली माँ …माँ को नमन भ्रमर ५

dineshaastik के द्वारा
April 27, 2012

कह दूँ भगवान  का रूप, हाँ मगर वो कहीं होगा तो शायद माँ के ही रूप में सच  कहा है किसी ने, ईश्वर को देखना है तो माँ को देख  लो, वास्तविक  ईश्वर वही है।

shashibhushan1959 के द्वारा
April 26, 2012

आदरणीय जीत जी, सादर ! माता के सहज यथार्थ रूप का वर्णन ! भाव बहुत सुन्दर !

nishamittal के द्वारा
April 26, 2012

माँ के प्रति आपके श्रद्धा भाव को व्यक्त करती सुन्दर रचना बहुत दिन बाद मिली जीत जी.बधाई.

ANAND PRAVIN के द्वारा
April 26, 2012

आदरणीय जीत सर, सादर प्रणाम मुझे आज आश्चर्य हुआ सर की यहाँ इतने दिनों से होने के बाद भी मैंने आपके ब्लोगों को नहीं देखा यह मेरी भूल ही थी सर……………………..सुन्दर अत्यंत सुन्दर भाव सर…. निश्चय ही माँ के बारे में आपने जो लिखा है सर वो ह्रदय की गहराइयों से लिखा है ………..आपको बधाई

akraktale के द्वारा
April 26, 2012

जीत जी नमस्कार, बहुत सुन्दर माँ को समर्पित रचना. हम माँ को कभी देवी कहकर नहीं बुलाते किन्तु देवी को हम अक्सर माँ ही कहते है. बधाई.

    rajkamal के द्वारा
    May 7, 2012

    bilkul sahi kaha hai sir ji aapne meri bhi sahmti hai waise bhi na hone ka to swaal hi paida hi nahi hota

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 26, 2012

सुन्दर अभिव्यक्ति

Mohinder Kumar के द्वारा
April 26, 2012

मलकीत सिंह जी, खूब लिखा आपने, सचमुच मां सबसे ऊपर है. बहुत पुरानी फ़िल्म का एक गाना याद आ गया जो मुझे बहुत प्रिय है “मां ही गंगा, मां ही यमुना, मां ही तीर्थ धाम मां का सर पर हाथ जो होवे, क्या ईश्वर का काम”


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