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जली रोटियां

Posted On: 16 Jan, 2012 में

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jali rotiyan241

जली रोटियां
##############################
सब ने देखी हैं माँ की बनाई किनारों से जली रोटियां ,
जो खाई भी गई मगर माँ को कोसते हुए
कभी गवार ,तो कभी जाहिल बनी माँ
मै बस देखता रहा
कुछ न कह सका
कुछ न कर सका
सिवा छुप के रोने के
अब  मै बड़ा हो चुका हूँ
देखता हूँ फिर वही दोहराते हुए
अपने उसी घर में
एक फर्क के साथ ,वही तया वही चूल्हा
और रोटियां भी वही ,मगर एक फर्क
मेरी माँ निभाती है अपनी सास की परंपरा को
और कोई मौका नहीं छोडती कोसने का
रोटियां सकती अपनी बहू को
न दिखे रोटियां सेकते माँ के जले हाँथ उस सास को
न दिखे रोटियां सेकते बहू के जले हाँथ इस सास को
और मै बुजदिल
आज भी कुछ नहीं कर पाता
सिवा छुप के रोने के …………

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

D33P के द्वारा
April 15, 2012

बहुत खूब जीत जी …..ये रिश्ता ही ऐसा है …….इसमें सास का कसूर नहीं ,उम्र के साथ उसे याद नहीं रहता कि वो भी कभी बहु थी

rahulpriyadarshi के द्वारा
January 17, 2012

क्यूंकि सास भी कभी बहु थी :) वैसे यह निस्संदेह बहुत सोचनीय स्थिति है…आपकी कलम ने इसको प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है.

nishamittal के द्वारा
January 17, 2012

सास बहु के सुन्दर रिश्ते को बदनाम न करें जीत जी..माँ भी तो अपने जमाने में ऐसी ही रोटियां बनाकर अपनी बेटी को तोक्तीऔर अच्छा करने की शिक्षा देती है और पिता भी अपने आप बार बार फेल होकर बेटे को ध्यान से पढ़ाई करने को कहते हैं.

    malkeet singh "jeet" के द्वारा
    January 17, 2012

    आदरनीय ,मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था ,बस शब्दों के माध्यम से ये सन्देश देने की कोशिश थी की जो दुःख हम सह चुके होते है दुसरो का वो दुःख हम आसानी से समझ सकते है परन्तु अकसर हम उस अवसर का सदुपयोग न कर के दुरउपयोग कर जाते है सास बहु तो इस सन्देश के पत्र मात्र है ऐसा ही कुछ बेटे बेटियों के रिश्ते करने में भी तो हो रहा है जहाँ अक्सर ये सोच हावी हो जाती है की मेरे दामाद ने दहेज़ में मोटर साईकिल मागी है बहु के मायके से मेरे बेटे को भी कार नहीं तो मोटर साईकिल तो माग ही लेनी चाहिए ,कान का कान तो मिले ही और एक बात और के घर के माहौल को खुश नुमा बनाने के लिए जहाँ सास बहु को एक दुसरे की पीड़ा समझने की जरुरत है वही पुरुष वर्ग को भी यदि कहीं कलह का विषय है मूकदर्शक न बन कर एक मध्यस्थ की भूमिका में होना चाहिए

akraktale के द्वारा
January 16, 2012

जीत जी, आप इत्मीनान रखें इससे अधिक कुछ नहीं होगा. क्योंकि ये सास बहु का रिश्ता है. ये अपनी परम्परा नहीं खो सकता.

shashibhushan1959 के द्वारा
January 16, 2012

आदरणीय जीत जी, सादर ! ठीक ही कहा गया है— “इतिहास अपने को दोहराता है.”

आर.एन. शाही के द्वारा
January 16, 2012

बेबशी की अनूठी दास्तान !

alkargupta1 के द्वारा
January 16, 2012

समय बदला .लोग बदले पर स्थिति वहीँ की वहीँ……. बहुत अच्छी भावपूर्ण रचना मलकीत सिंह जी

minujha के द्वारा
January 16, 2012

बहपत बढिया मलकीत जी पात्र बदल गए पर हालात नही.

    minujha के द्वारा
    January 16, 2012

    कृप्या बहुत पढें बहपत नही

Vinay pathak के द्वारा
January 16, 2012

That’s true, but truth is always bitter thanks


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