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मातृभूमि के लिए बलिदान होने वाली देश की बेटी -वीरांगना : झलकारी बाई जन्म दिन विशेष

Posted On: 21 Nov, 2011 Others में

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Jhalkaari-Bai-Bundelkhandimages.jpgraniबांदा बुन्देलखण्ड झांसी १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम और बाद के स्वतन्त्रता आन्दोलनों में देश के अनेक वीरो और वीरांगनाओं ने अपनी कु र्बानी दी है। देश की आजादी के लिए शहीद होने वाले ऐसे अनेक वीरो और वीरांगनाओं का नाम तो स्वर्णक्षरों में अकित है किन्तु बहुत से ऐसे वीर और वीरांगनाये है जिनका नाम इतिहास में दर्ज नहीं है। तो बहुत से ऐसे भी वीर और वीरांगनाएं है जो इतिहास कारों की नजर में तो नहीं आ पाये जिससे वे इतिहास के स्वार्णिम पृष्टों में तो दर्ज होने से वंचित रह गये किन्तु उन्हें लोक मान्यता इतनी अधिक मिली कि उनकी शहादत बहुत दिनों तक गुमनाम नहीं रह सकी । ऐसे अनेक वीरो और वीरांगनाओं का स्वतन्त्रता संग्राम में दिया गया योगदान धीरे – धीरे समाज के सामने आ रहा है। और अपने शासक झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के प्राण बचाने के लिए स्वयं वीरांगना बलिदान हो जाने वाली वीरांगना झलकारी बाई ऐसी ही एक अमर शहीद वीरांगना है जिनके योगदान को जानकार लोग बहुत दिन बाद रेखाकित क र पाये है। झलकारी जैसे हजारों बलिदानी अब भी गुमनामी के अधेरे में खोये है जिनकी खोजकर स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की भी वृद्धि करने की पहली आवश्यकता है। वीरांगना झलकारी बाई झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की सेना में महिला सेना की सेनापति थी जिसकी शक्ल रानी लक्ष्मी बाई से हुबहू मिलती थी। झलकारी के पति पूरनलाल रानी झांसी की सेना में तोपची थे। सन् १८५७ के प्रभम स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेंजी सेना से रानी लक्ष्मीबाई के घिर जाने पर झलकारी बाई ने बड़ी सूझ बुझ स्वामिभक्ति और राष्ट्रीयता का परिचय दिया था। निर्णायक समय में झलकारी बाई ने हम शक्ल होने का फायदा उठाते हुए स्वयं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गयी थी और असली रानी लक्ष्मी बाई को सकुशल झांसी की सीमा से बाहर निकाल दिया था और रानी झांसी के रूप में अग्रेंजी सेना से लड़ते – लड़ते शहीद हो गयी थी।

वीरांगना झलकारी बाई के इस प्रकार झांसी की रानी के प्राण बचाने अपनी मातृ भाूमि झांसी और राष्ट्र की रक्षा के लिए दिये गये बलिदान को स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भले ही अपनी स्वार्णिम पृष्टों में न समेट सका हो किन्तु झांसी के लोक इतिहासकारो , कवियों , लेखकों , ने वीरांगना झलकारी बाई के स्वतंत्रता संग्राम में दिये गये योगदान को श्रृद्धा के साथ स्वीकार किया है। वीरांगना झलकारी बाई का जन्म २२ नवम्बर १८३० ई० को झांसी के समीप भोजला नामक गांव में एक सामान्य कोरी परिवार में हुआ था जिसके पिता का नाम सदोवा था। सामान्य परिवार में पैदा होने के कारण झलकारी बाई को औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर तो नहीं मिला किन्तु वीरता और साहस झलकारी में बचपन से विद्यमान था। थोड़ी बड़ी होने पर झलकारी की शादी झांसी के पूरनलाल से हो गयी जो रानी लक्ष्मीबाई की सेना में तोपची था। प्रारम्भ में झलकारी बाई विशुद्ध घेरलू महिला थी किन्तु सैनिक पति का उस पर बड़ा प्रभाव पड़ा धीरे – धीरे उसने अपने पति से से सारी सैन्य विद्याएं सीख ली और एक कुशल सैनिक बन गयी। इस बीच झलकारी बाई के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटी जिनमें उसने अपनी वीरता साहस और एक सैनिक की कुशलता का परिचय दिया। इनकी भनक धीरे – धीरे रानी लक्ष्मीबाई को भी मालूम हुई जिसके फलस्वरूप रानी ने उन्हें महिला सेना में शामिल कर लिया और बाद से उसकी वीरता साहस को देखते हुए उसे महिला सेना का सेनापति बना दिया। झांसी के अनेक राजनैतिक घटना क्ररमों के बाद जब रानी लक्ष्मीबाई का अग्रेंजों के विरूद्ध निर्णायक युद्ध हुआ उस समय रानी की ही सेना का एक विश्वासघाती दूल्हा जू अग्रेंजी सेना से मिल गया था और झांसी के किले का ओरछा गेट का फाटक खोल दिया जब अग्रेंजी सेना झांसी के किले में कब्जा करने के लिए घुस पड़ी थी। उस समय रानी लक्ष्मीबाई को अग्रेंजी सेना से घिरता हुआ देख महिला सेना की सेनापति वीरांगना झलकारी बाई ने बलिदान और राष्ट्रभक्ति की अदभुत मिशाल पेश की थी। झलकारी बाई की शक्ल रानी लक्ष्मीबाई से मिलती थी ही उसी सूझ बुझ और रण कौशल का परिचय देते हुए वह स्वयं रानी लक्ष्मीबाई बन गयी और असली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को सकुशल बाहर निकाल दिया और अग्रेंजी सेना से स्वयं संघर्ष करती रही।

बाद में दूल्हा जी के बताने पर पता चला कि यह रानी लक्ष्मी बाई नहीं बल्कि महिला सेना की सेनापति झलकारी बाई है जो अग्रेंजी सेना को धोखा देने के लिए रानी लक्ष्मीबाई बन कर लड़ रही है। बाद में वह शहीद हो गयी। वीरांगना झलकारी बाई के इस बलिदान को बुन्देलखण्ड तो क्या भारत का स्वतन्त्रता संग्राम कभी भुला नहीं सकता

देखते है अवसर वादी नेताओ को इनकी याद आती है के नहीं

*फोटो ,सामग्री साभार गूगल नेट*

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chandrakant के द्वारा
February 20, 2014

ITIHAS GHADAYA MATA ZALKARI MAI NE OR BRAMNONE BATAYA KI ITIHAS GHADAYA ZHASI KI RANI NE SAB BAHUJANO KO BRAMNONE BEHAKUB BANAYA SAB ZUTA ITIHAS BATAYA………….KALAM KASAI SALE……

kuldeep के द्वारा
April 13, 2013

thanks for the post ………… http://www.kuldeepsir.com

Satyapal Chayal Tosham के द्वारा
November 19, 2012

आज भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखने वाली और केवल 30 वर्ष की आयु में देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर देने वाली “महा वीरांगना” झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जी का 184वां जन्मदिवस है। आइये हम सब मिलकर उन्हें नमन करें और जानें कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य एक वीर नारी के जीवन के बारे में: रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर, 1828 को उत्तर प्रदेश के पवित्र नगर काशी (वाराणसी) में हुआ। इनके पिता श्री मोरोपंत ताम्बे और माता श्रीमती भागीरथीबाई ताम्बे थे, जो मूलतः महाराष्ट्र के थे। इनका जन्म के समय नाम रखा गया “मणिकर्णिका” जो बाद में “मनु” हो गया। चार वर्ष की आयु में माता के देहांत के बाद इनका लालन-पालन इनके नाना जी ने किया जो बिठूर जिले में पेशवा थे। उन्होंने मनु के निर्भीक और शरारती स्वभाव को देख उन्हें “छबीली” नाम दिया। मनु की शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई, जिसमें उन्होंने पुस्तकीय अध्ययन के अतिरिक्त तलवारबाजी, घुड़सवारी और आत्म रक्षा के गुर भी सीखे। 14 वर्ष की आयु में इनका विवाह झाँसी के राजा श्री गंगाधर राव नेवालकर के साथ कर दिया गया और वे मनुबाई से लक्ष्मीबाई हो गयीं। 1851 में इन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम दामोदर राव रखा गया परन्तु दुर्भाग्य से वह पुत्र केवल चार माह की आयु में मृत्यु को प्राप्त हो गया। इसके पश्चात इन्होंने राजा गंगाधर राव के चचेरे भाई के पुत्र आनंद राव को गोद ले लिया और उसका नाम भी दामोदर राव ही रखा। नवम्बर, 1853 में राजा गंगाधर राव का भी देहांत हो गया और वे झांसी की रानी बनी। उसके बाद 1857 गाय की चर्बी वाले कारतूसों की खबर को लेकर मेरठ से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बगावत शुरू हुई तो इसी विद्रोह के चलते बिलकुल शांत झांसी पर अंग्रेजी फौज ने हफ रोज़ की अगुआई में कब्ज़ा कर लिया और यहाँ से रानी लक्ष्मीबाई की भी इस संग्राम में भूमिका प्रारम्भ हो गई। झांसी ने अपने आप को कमजोर अनुभव करते हुए तात्या टोपे से सहायता मांगी और तात्या टोपे ने 20000 सैनिकों के साथ झांसी को अंग्रेजों से बचाने में पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन अंग्रेजों के सामने कुछ न किया जा सका। आखिर में रानी लक्ष्मी बाई ने किला छोड़कर तात्या टोपे के साथ शामिल होने का निर्णय लिया और झाँसी को छोड़ कर अपने कुछ सैनिकों के साथ काल्पी चली गयी। 22 मई, 1958 को अंग्रेजों ने काल्पी पर आक्रमण कर दिया और दुर्भाग्य से वहां भी रानी को हार का सामना करना पड़ा। उसके बाद रानी लक्ष्मी बाई, तांत्या टोपे, बाँदा के नवाब और राव साहेब वहां से ग्वालियर चले गए और ग्वालियर के किले में रह कर मुकाबला करने की रणनीति बनाई। अंग्रेज 16 जून, 1858 को ग्वालियर पहुंचे और एक बार फिर उन्होंने भारतीय सेना पर सफल आक्रमण किया। इस बार रानी ने फिर बहादुरी से अंग्रेजी आक्रान्ताओं का सामना किया। 18 जून को ग्वालियर के फूल बाग़ के नजदीक कोटा सराय नाम की जगह पर हमलावरों से घिर चुकी रानी घोड़े से गिर गयी, लेकिन फिर भी अंग्रेजी सैनिकों का डट कर मुकाबला करती रही। अंत में बुरी तरह पस्त हो चुकी “महा वीरांगना” ने प्राण त्याग दिए।

akraktale के द्वारा
November 23, 2011

जीत जी, अवश्य ही हम झलकारी बाई के बलिदान को कभी नहीं भुला सकते. और सिर्फ झलकारी ही क्यों स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए एक एक वीर योद्धा को हम नमन करते हैं.तात्कालीन साहित्यकार हरेक के बारे में तो नहीं लिख पाए होंगे किन्तु उस समय के एक एक सैनिक का योगदान महत्वपूर्ण था.रोचक जानकारी देता आलेख.धन्यवाद.

alkargupta1 के द्वारा
November 23, 2011

वीरांगना झलकारीबाई की जीवनगाथा को मंच पर साझा करने के लिए बहुत धन्यवाद ऐसी वीरांगना के बलिदान को कदापि भुलाया नहीं जा सकता है……..इस वीरांगना को मेरा शत-शत नमन !

abodhbaalak के द्वारा
November 22, 2011

ज्ञानवर्धक लेख, जानकार भी शायद हम सब अब इन बातो को ………….. अगर आपने इसे बड़े फॉण्ट के द्वारा पोस्ट किया होता तो पढने में आसानी होती मलकीत भाई http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

allrounder के द्वारा
November 22, 2011

नमस्कार भाई मलकीत सिंह जी , वीरांगना झलकारी बाई के जन्म दिवस पर उनको शत – शत नमन ! और भारत की ऐसी वीरांगना की बीर गाथा मंच पर साझा करने के लिए आपका आभार !

minujha के द्वारा
November 22, 2011

मलकीत जी नमस्कार इस वीरांगना की गाथा हम सबसे बॉटने के लिए आभार व्यक्त करना चाहुंगी,थोङा बहुत सुना अवश्य था पर विस्तृत जानकारी मिली आपके आलेख से,धन्यवाद

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
November 22, 2011

प्रिय मलकीत भाई सुन्दर आलेख ..सीख देता हुआ .आओ ऐसे वीरांगनाओं को नमन करें आज के बच्चियों में भी जोश फूंके …भ्रमर ५ अपने शासक झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के प्राण बचाने के लिए स्वयं वीरांगना बलिदान हो जाने वाली वीरांगना झलकारी बाई ऐसी ही एक अमर शहीद वीरांगना है जिनके योगदान को जानकार लोग बहुत दिन बाद रेखाकित क र पाये है। झलकारी जैसे हजारों बलिदानी अब भी गुमनामी के अधेरे में खोये है

shashibhushan1959 के द्वारा
November 22, 2011

मान्यवर जीत जी, सादर. बड़ी ख़ुशी हुई कि आपने इन क्रांतिकारी वारांगना को याद ही नहीं किया, अन्य लोगों को भी याद कराया. ये ही महान क्रांतिकारी स्वराज्य के भव्य महल की नींव के पत्थर हैं. हम उन्हें याद रखे हैं , यह जानकार उन वीरों की आत्माएं कितना चैन पाती होंगी, यह सोच कर ही अच्छा लगता है. बधाई.

nishamittal के द्वारा
November 22, 2011

जीत जी ,ऐसे बलिदानियों की शहादत को कोटिश नमन ऐसे गुमनाम वीरों के ऋण से देश कभी उरिन नहीं हो सकता

    nishamittal के द्वारा
    November 22, 2011

    जीत जी आभार आपका भी परिचित करने के लिए.

Rajkamal Sharma के द्वारा
November 21, 2011

इतनी बढ़िया रचना में अगर कुछ कमी महसूस हुई तो वोह था शब्दों का छोटा होना –अगर बोल्ड आप्शन का इस्तेमाल भी किया जाता तो पढ़ने में सुविधा रहती….. अगर ज्क्ल्कारी बाई की शिनाख्त न हो पाती तो भी रानी लक्ष्मीबाई जी को काफी ज्यादा समय मिल जाता सुरक्षित निकल कर जाने में ….. होई है वोही जो राम रची राखा !


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