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वो मेरे घर की ऊँची दीवारे ,

Posted On: 6 Nov, 2011 Others में

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बचपन से ही लगीं मुझको एक बंधन सी

वो मेरे घर की ऊँची दीवारे ,

ऊँचा कूदता ,फिर भी न देख पाता उनके पार

कोसता उन्हें क्यों बनाई गईं
वो मेरे घर की ऊँची दीवारे ,
पढ़ा लिखा बढ़ा उन्ही को कोसता
तो कभी बनाने वालों को ,क्यों बनाई
वो मेरे घर की ऊँची दीवारे ,
बंध गया एक रोज़ उन्ही दीवारों में ब्याह के बंधन
बसाने को नई दुनिया ,गृहस्थी ,अब देने लगीं है सुकून मुझे भी
वो मेरे घर की ऊँची दीवारे ,
समय बदला एक और करवट ,जब से जन्म लेके आई मेरी बेटी
अब तो लगने लगी है बहुत छोटी मुझे
वो मेरे घर की ऊँची दीवारे ,……………….

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

abodhbaalak के द्वारा
November 10, 2011

ह्रदय को छू लेने एवाली रचना मलकीत जी, http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

nishamittal के द्वारा
November 8, 2011

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना बिटिया के बड़े होते ही वही बंधन वाली दीवारें छोटी लगने लगी.

RaJ के द्वारा
November 7, 2011

मन ऊँचा व विस्तृत हो तो सब ही रुणीवादी दीवारें छोटी ही नहीं गिर भी जाती हैं जीत जी आप जीत गए http://jrajeev.jagranjunction.com

akraktale के द्वारा
November 7, 2011

जीत जी नमस्कार, बहुत ही गहरा अनुभव प्राप्त किया है आपने, इस अनुभव के ऊपर खड़े होकर वाकई ये दीवारें छोटी ही लगेंगी. बिटिया के बढ़ने के साथ ही ये दीवारें और भी छोटी होती जायेंगी. हार्दिक बधाई.

shashibhushan1959 के द्वारा
November 7, 2011

इसको ही कहते हैं अनुभव, ये सब हैं जीवन के भेद, बूढ़ों के ऐसे ही होते नहीं धुप में बाल सफ़ेद. . बहुत भावुक कविता.

alkargupta1 के द्वारा
November 7, 2011

बेटियों के आने से जीवन में बहुत कुछ बदल जाता है….बड़ी ही मोहिनी होती हैं…..बहुत सुन्दर व अर्थ पूर्ण रचना !

sandhya yadav के द्वारा
November 7, 2011

जीत जी बेटियों की दशा पर प्रकाश डालती सार्थक प्रस्तुति


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