फुर्सत के दिन/fursat ke din

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दीपमाला

Posted On: 16 Oct, 2011 Others में

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sdddd दीपमाला से सज़ा सारा शहर,

दिल की गली फिर भी अँधेरी रह गई

जाने कहाँ हम खो गए ,खुशयां हमारी

अब हंसी बस तेरी यां मेरी रह गई

1maa

कान फोडू शोर की “तहजीब” में सब खो गए

घर में” माँ” फिर से अकेली रह गई

chulhe

अब तो मेरे घर भी चूल्हे चार है

गाँव पूरा एक चूल्हा ,बस पहेली रह गई

चार आने में तभी चलता था घर

घर चला जब आज मै खाली हथेली रह गई

hanthi

उजाले भी नहीं आते बिना रिश्वत के घर

जब से “बहना”सत्ता की सहेली हो गई

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
October 18, 2011

मलकीत सिंह जी नमस्कार, बहुत ही सुन्दर चित्र-कविता है आपकी,दिल की सारी बातें आपने बिलकुल वैसी की वैसी रखदी जो आपने और सामाजिक संस्कृतियों में विशवास करने वाले हर व्यक्ति ने महसूस किया है.बधाई.

राही अंजान के द्वारा
October 16, 2011

बहुत ही सुंदर रचना मलकीत जी । हर पंक्ति में आज के परिदृश्य का कटु-सत्य गहरे तक घुसा हुआ सा लगता है । बहुत बहुत आभार आपका ! :)

    malkeet singh jeet के द्वारा
    October 17, 2011

    राही अंजान जी उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
October 16, 2011

समयानुकूल बहुत ही सुन्दर रचना! मलकीत सिंह जी, नमस्कार और बधाई! उजाले भी नहीं आते बिना रिश्वत के घर जब से “बहना”सत्ता की सहेली हो गई

    malkeet singh jeet के द्वारा
    October 16, 2011

    धन्यवाद सिंह साहब , सत्ता की सहेली से तो राम ही बचाएं प्रदेश को अभी तो हांथी चला था दिल्ली ली और दिन अच्छे थे देश के की रुक गया वरना ………………

Santosh Kumar के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय मलकीत जी ,.सादर नमस्कार बहुत ही अच्छी रचना ,….क्या बात कही ” दिल की गली फिर भी अँधेरी रह गयी “.. सत्ता की सहेली ज्यादा दिन नहीं ……….पूरी लूट है ,…जनता जानती है , आपको हार्दिक बधाई

    malkeet singh jeet के द्वारा
    October 16, 2011

    संतोष कुमार जी सत्ता की सहेली से तो राम ही बचाएं प्रदेश को अभी तो हांथी चला था दिल्ली ली और दिन अच्छे थे देश के की रुक गया वरना आज कांग्रेस को कोई नहीं कोसता क्यों ? क्योकि बड़ी दुर्घटना के बाद लोग छोटी दुर्घटना को भूल जाते है बस ये दुर्घटनाये बिचारी जनता से हो गई

    sandhya yadav के द्वारा
    October 17, 2011

    संतोष जी व् जीत जी इस लूट काजवाब तो जनता बहन जी से जरुर लेगी

naturecure के द्वारा
October 16, 2011

आदरणीय मलकीत जी सादर अभिवादन! बहुत सुन्दर शब्दों में आपने हकीकत बयां की है | बहुत-बहुत बधाई ………|

    malkeet singh jeet के द्वारा
    October 16, 2011

    धन्यवाद मान्यवर

abodhbaalak के द्वारा
October 16, 2011

बहुत ही खूबसूरत रचना मलकीत जी, क्या से क्या हो गया? सब बदल सा गया है. सब खोता सा जा रहा है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    malkeet singh "jeet" के द्वारा
    October 16, 2011

    सब खोता सा जा रहा है लेकिन आबोध जी हम बचने की कोशिश भी तो नहीं करते , नहीं तो अभी कुछ नहीं बिगड़ा फिर से पुराने दिन लौट सकते है

nishamittal के द्वारा
October 16, 2011

जीत जी त्यौहार हम मनाते हैं परन्तु कुछ खो सा गया वो उल्लास और शेष रह गया है दिखावा और होड़ सुन्दर कविता

    malkeet singh "jeet" के द्वारा
    October 16, 2011

    माता श्री दिखावे के प्रपंचों ने ही तो रिश्तों में दरारे डालनी शुरू कर दी है प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

vikasmehta के द्वारा
October 16, 2011

नमस्कार जी ………..यह पंक्ति मुझे बहुत अच्छी लगी र उन यादो को ताज़ा कर गयी जब मई दीवाली पर बम्ब बजता था और माँ अकेली रह जाती थी चुकी पिता जी दूकान बढ़ाने के बाद आते थे कान फोडू शोर की “तहजीब” में सब खो गए घर में” माँ” फिर से अकेली रह गई

    malkeet singh "jeet" के द्वारा
    October 16, 2011

    व्यावसायिकता ने हमें घर परिवार से दूर करही दिया है विकास जी धन्यवाद

syeds के द्वारा
October 16, 2011

मलकीत जी, सुन्दर रचना के लिए बधाई के पात्र हैं… http://syeds.jagranjunction.com

    malkeet singh "jeet" के द्वारा
    October 16, 2011

    धन्यवाद सर जी


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