फुर्सत के दिन/fursat ke din

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समाज!!---मेरी उमंगें

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aaaaaa

बस अपनी गति से आगे बढे जा रही थी ,पर मेरे ख्याल बार बार वहीँ लौट आते थे

कानो में बार बार शहनाई की धुन गूंजने  लगती ,कभी हनथो में लगी महंदीनज़र आने लगती ,तो कभी सेहरे से सजा एक अंजान चेहरा , कभी हस्ते खेलते लोग ……………..

…………………….कितनी उमंगें थी दिल में कितने अरमान थे |कई किस्से सुन रक्खे थे शादी के बारे में ,किस्से  हकीकत में बदलने को बेताब थे ,बारात आई ,स्वागत हुआ ,रस्मे पूरी हुई और ढेरों अरमान लिए मै ससुरह के लिए विदा हो गई

ससुराल पहुची ,जैसे खुशियाँ मेरे साथ साथ यहाँ तक चली आई थीं  सजा हुआ  घर ,गाजे बजे ,कुछ लोग नाचने गाने में मस्त थे तो कुछ लोग साथ आया दहेज़ का सामान सलीके से उतार रहे थे

कुछ दुल्हन को देख रहे थे ,तो कुछ दुल्हन के दहेज़ को |

दो तीन दिनों में ही मेहमान जा चुके थे घर में सास ,ससुर ,ननददेवर ,और वो जो अब अंजान न था बस इतने ही लोग ,जिनकी रूचि अब बहु में कम उसके दहेज़ में ज्यादा थी | शायद  किस्सों की हकीकत ने एक और करवट बदली थी |

अब चर्चा का विषय बदल चूका था |बहु ये लाई ये  नहीं लाई से वो क्यों नहीं लाई चर्चा में शामिल हो चूका था

धीरे धीरे चर्चा बहस में और बहस जिद में तब्दील हो है कुछ ही दिनों में अरमान और उम्मंगें लम्बी डिमांड लिस्ट के नीचे दब गईं

दो ही मैनो में मांग पूरी न होने पर बहु घर से बहार और बदचलनी का आरोप ………..

इतना सब काफी था मेरी मायके वापसी और पिता जी के हृदयाघात के लिए ,

“बहन जी महिपाल पुर आ गया ” कंडक्टर की आवाज ने मुझे वर्तमान में ला दिया | अब मुझे तीस मील का सफ़र ऑटो से करना था गोसाई पूरा का ,जहाँ पिता जी के मित्र और  मेरे पूज्य गुरु जी आचार्य धर्मेन्द्र  जी रहते थे |

ऑटो के गति पकड़ते ही मन फिर पुराणी बाते सोचने लगा -पिता जी के बाद पिछले दो साल में चार ख़त गुरु जी के बुलावे के मिल चुके थे पर हर बार घर की इज्जत ,समाज का ख्याल , लोग क्या कहेंगे की बातें मुझे कितने कितने तरीको से बताई गईं | आखिर मेरे सब्र का भी अंत हो चूका था -मैं क्यों सोचुसमाज के बारे में जिसने मेरे बारे में नहीं सोचा ,क्यों ख्याल करूँ लोगों की बातों का उन्होंने मेरा क्या ख्याल किया ,कहाँ था समाज जब दहेज़ दानव ने मेरे सर से एक पिता का साया छीना

क्यों न दी गई यह शिक्षा उन राक्षसों को जिनकी मै बहु ,भाबी ,पत्नीथी

मैमे अगर पहल न की तो कोई लड़की न कर सकेगी |

मै निकलूगी  घर से ,जाऊगी पढ़ाने| फिर से शुरू  करुँगी जीवन और फिर से तलाश करुँगी वो उम्मीदे  वो उमंगें

जो ये समाज न दे सका

मलकीत सिंह जीत

9935423754

jeetrohann @gmail .com

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

संदीप कौशिक के द्वारा
April 25, 2011

मलकीत जी , जैसे जैसे इस मर्मस्पर्शी कथा का एक-एक शब्द पढ़ता गया, दिल पर मानो कोई अंजाना सा आघात आ पड़ा हो | आज के समाज की कड़वी हक़ीक़त से रु-ब-रु कराती इस रचना में आपकी लेखन-शैली ने तो चार चाँद लगा दिये | पढ़कर अच्छा भी लगा और सोचने पर मजबूर भी हुआ कि आजकल हम किस समाज में जी रहें हैं या यूं कहें कि बाकी बची उम्र काट रहे हैं ||

    malkeet singh "jeet" के द्वारा
    April 26, 2011

    कौशिक जी धन्यवाद ,आपकी प्रतिक्रिया मिली अच्छा लगा

kumar arvind के द्वारा
April 25, 2011

 सुंदर आशावादी    भावनात्मक रचना के लिए बधाई ,देर से प्रतिक्रिया के लिए क्षमा प्रार्थी

    malkeet singh jeet के द्वारा
    April 25, 2011

    धन्यवाद अरविन्द जी

raghvensra raj के द्वारा
April 25, 2011

दिल को छूती कहानी को पेश करने के लिए आपका आभार l

    malkeet singh jeet के द्वारा
    April 25, 2011

    धन्यवाद राज जी

ARUNESH GOUTAM के द्वारा
April 25, 2011

एक सार्थक कोशिश. बहुत अच्छी

    malkeet singh jeet के द्वारा
    April 25, 2011

    धन्यवाद गौतम जी

allrounder के द्वारा
April 7, 2011

मलकीत सिंह जी, नमस्कार समाज के इस घिनौने रूप को उजागर करते और ऐसी लड़कियों को ऐसे हालत से लड़ने का सन्देश देते एक अच्छे सार्थक लेख पर हार्दिक बधाई !

    malkeet singh के द्वारा
    April 8, 2011

    धन्यवाद सचिन जी

Alka Gupta के द्वारा
April 6, 2011

दहेज़ प्रथा जैसी बुराई का जब तक हम सब मिलकर विरोध नहीं करेंगे तब तक ऐसे ही समाज में फैलती रहेगी इसे दूर करने के लिए समूल उत्खनन करना होगा तभी कुछ सीमा तक इस बुरी को दूर किया जा सकता है !अच्छी पोस्ट है !

    Alka Gupta के द्वारा
    April 6, 2011

    बुरी को कृपया ‘ बुराई ‘ पढ़ें

    MALKEET SINGH JEET के द्वारा
    April 7, 2011

    आपका आशीर्वाद मिला ख़ुशी हुई एव आगे भी लिखते रहने की प्रेरणा मिली धन्यवाद

charchit chittransh के द्वारा
April 5, 2011

जीत जी ; जय हिंद !यी पोस्ट का मेल मिला पढ़कर मजा आ गया ! दहेज़ और भ्रष्टाचार जैसे दानव अकेले क़ानून की कड़ाई से दूर नहीं होंगे . हम सब को मिलकर इनके विरुद्ध खड़ा होना होगा . वैसे ईश्वर के आशीर्वाद से मेरी ३ बहनों व् मेरी शादी में इसकी समस्या नहीं आई बहनों को दहेज़ मांग रहित ससुराल १९७६, १९८३, १९९४ व् मुझे १९८८ में मिली {हमारी जाती में यह कुप्रथा बहुत पुरानी होते हुए भी } शायद हम देने की स्थिति में नहीं थे और लेने के विरोधी इसीलिये…..

    charchit chittransh के द्वारा
    April 5, 2011

    कृपया पंक्तियाँ इस तरह पढ़िये जीत जी ; जय हिंद ! आपके ब्लॉग को फालो करने के कारन आपकी नयी पोस्ट का मेल मिला पढ़कर मजा आ गया ! दहेज़ और भ्रष्टाचार जैसे दानव अकेले क़ानून की कड़ाई से दूर नहीं होंगे . हम सब को मिलकर इनके विरुद्ध खड़ा होना होगा . वैसे ईश्वर के आशीर्वाद से मेरी ३ बहनों व् मेरी शादी में इसकी समस्या नहीं आई बहनों को दहेज़ मांग रहित ससुराल १९७६, १९८३, १९९४ व् मुझे १९८८ में मिली {हमारी जाती में यह कुप्रथा बहुत पुरानी होते हुए भी } शायद हम देने की स्थिति में नहीं थे और लेने के विरोधी इसीलिये…..

    charchit chittransh के द्वारा
    April 5, 2011

    कृपया पंक्तियाँ इस तरह पढ़िये जीत जी ; जय हिंद ! आपके ब्लॉग को फालो करने के कारन आपकी नयी पोस्ट का मेल मिला पढ़कर मजा आ गया ! दहेज़ और भ्रष्टाचार जैसे दानव अकेले……

    Malkeet Singh JeeT के द्वारा
    April 6, 2011

    charchit chittransh ji धन्यवाद आपको और हमारी बड़ी बहनों को इसी शादी के लिए ढेरों शुभकामनाये जो आप बाब ने समाज के सामना एक उदाहरण प्रस्तुत किया

amita के द्वारा
April 5, 2011

मलकीत जी बधाई…..                       दहेज हमारे समाज से कब खत्म होगा …..

    Malkeet Singh JeeT के द्वारा
    April 6, 2011

    अमिता जी दहेज़ से हम तभी बच सकेगे जब लेने से बचने की इच्छाशक्ति विकसित कर सकेगे

abodhbaalak के द्वारा
April 5, 2011

मलकीत जी आज पहली बार आपको पढने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है और पहली ही रचना ने दिल को छू लिया, दहेज़ जैसे दानव को ख़त्म करने का प्रयास हम सब को करना होगा, नहीं तो न जाने कितने बेटियों / बहुओं की बलि ……… http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    Malkeet Singh JeeT के द्वारा
    April 5, 2011

    अबोध जी आपकी प्रतिक्रिया मिली , धन्यवाद आगे भी ध्यान चाहुगा

vinita shukla के द्वारा
April 5, 2011

‘दुल्हन ही दहेज़ है’ जो लोग ये बात न समझ पाए, उनका बहिष्कार करना ही उचित है. सुन्दर सोच को उजागर करती हुई सार्थक पोस्ट. बधाई.

    Malkeet Singh JeeT के द्वारा
    April 5, 2011

    पतिक्रिया के लिए धन्यवाद विनीता जी


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