फुर्सत के दिन/fursat ke din

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भ्रूण हत्या विशेष "काश वो जिन्दा होती "

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शायद  ही  कोई  नजर  थी  जो  रिख्शे  पे  न  गयी  हो  |राजीव  की  बगल  में  बैठी  निशा   खूब 
फब  रही  थी |लेकिन  उदास  चेहरा  जैसे  चाँद  का  दाग  बन  गया  था  ;
          कितनी  ख़ुशी  ख़ुशी  दोनों  रिक्शे  पे  सवार  हुए  थे  हास्पिटल  जाने  के  लिए  | ख़ुशी
 की  बात  भी  थी  शादी  के  तीसरे  ही  महीने  निशा  उम्मीद  से  थी  |मन  जी  कई  दिन  से  राजीव 
से  कह  रही  थी  हास्पिटल  जाने   के  लिए  ,आखिर  उन्हें  निशा  से  पोते  की  उम्मीद  जो  थी  |लेकिन
हास्पिटल  से  निकलते  वक्त  राजीव  का  चेहरा  उतरा  हुआ  था  और  निशा  का  भी  | राजीव  बार  बार 
सोच  रहा  था  ‘माँ  को  कैसे  समझाऊ  गा  की  निशा  के  पेट  में  कड़का  नहीं  लड़की  है  |…….
………….. निशा  का  रो  रो  कर  बुरा  हाल  था  |कल  से  अन्न  का  एक  दाना  भी  निगला  था  |कुछ 
कमजोरी   तो  गर्भपात   के  कारण थी  और  कुछ   लगातार  रोने  से  ; माँ  -बाबूजी  कई  बार 
समझा  चुके  थे  ‘बच्चे  का  क्या  है  फिर  आजाये  गा  कमसे  कम  लड़का  तो  होगा | 
   पर  निशा  की  तो  जैसे  किसी  ने  जान  ही  निकल  ली  हो  और  एक  बुत  छोड़  दिया  हो  |आखिर  उसकी
पहली  ओलाद  को  माँ  जी  की  पोते  की  जिद  ने  छीन  लिया  था 
               निशा  गुमसुम  बैठी  सोच  रही  थी  ,क्या  लडकी  इस  संसार  के  लिए  जरुरी  नहीं  ?
है ,क्या  लड़की  के  बिना  परिवार  चल  सकते  है ?,क्या  उसकी  माँ  ने  उसे  जन्म  नहीं  दिया  था  ?  
      राजीव  आये  आज  आफिस  से   वादा  ले  लू  गी  की  अब लड़का हो या  लड़की  मै  दोबारा  गर्भपात 
नहीं कराउगी   |अपने  जीतेजी  अपनी  ओलाद  को  ऐसे  मरने  नहीं  दुगी |
        राजीव  चौथे  दिन  घर  लौट   रहा  था  |तीन  सौ   किलोमीटर  का  सफ़र  पता ही  नहीं  कब 
निशा  के  ख्यालो  में  बीत  गया  |ज्यो  ज्यो  अपना  शहर  पास  आता  जा  रहा  था  लगता  था  train
जानबूझ  कर  धीरे  चलने  लगी  थी
     तभी  एक  जोर  के  धमाके  के  साथ  ट्रेन  रूकती  सी  लगी ,पूरे  डिब्बे  में  जैसे  भूचाल 
सा  आ  गया  था  | ऊपर  की  सीटों  का  सामान  यात्रिओ  के  ऊपर  गिरता  नजर  आया   जब  तक  कोई  कुछ
 समझ  में  आता  कोई   भारी  चीज  सर  पर  लगी  और  राजीव  की  चेतना  लुप्त  हो  गयी |
             हास्पिटल  में  चारो  और  चीख  पुकार  सी  मची  थी  राजीव  को  आभी  अभी  होश  आया 
था  निशा  बैड के  पास  पड़ी  कुर्सी  पर  उंघती  सी  बैठी  थी | जब  से  शिनाख्त  के  बाद 
राजीव  को  प्राइवेट   हास्पिटल  में  शिफ्ट  कराया  था  निशा  ,माँ जी  , व  बाबूजी   बारी  बारी  से 
उसके  पास  उसके  पास  बैठ  ते  थे  | आज  36 घंटो  के  इंतजार  के  बाद   उसने  आँखे  खोली  थी
फिर  डॉ .ने  नीद  का   इंजेक्शन  दे  कर  सुला  दिया  था 
       डॉ . के  कहे  शब्द  बार  बार  राजीव  के  जहाँ  में  घूम  रहे  थे  -सर  की  चोटें  तो  हफ्ते
 दस  दिन में  ठीक  हो  गए  गी  लेकिन  पेट  के  निचे  का  हिस्सा  वजनी  भार  में  दबा  रहने  के  कारण 
चलने  लायक  आप  दो  से  तीन  महीने  में  ही  हो  पाए  गे  | मुझे  अफ़सोस  के  साथ  कहना  पड़
 रहा  है  की  चोटों  की  वजह  से  गुप्तांग  की  शुक्र्स्दु  वाली  नलिकाए  डेड   हो  चुकी  हैजिसके  कारण 
आप  वैवाहिक  जीवन  तो  नार्मल ही व्यतीत  करेंगे  परन्तु  संतान  सुख  न  पा  सके  गे  ……..
….. एक्सीडेंट  के  बाद तो  जैसे  पूरा   घर  ही   उदासियो  में  घिर  गया  था  |राजीव  अब  चलने  फिरने 
लगा  था  पर  खुशिओ  का  कोई  निशान  घर  के  किसी  भी  सदस्य  के  चेहरे  पर  न  था  |
         आज  सभी  एक  ही   बात  सोच  रहे  थे  की  काश  निशा  का  गर्भपात  न  कराया 
होता  ,अगर  लड़की  पैदा  होती  तो  क्या  था  होता  तो  अपना  ही  खून  राजीव  और  निशा  की अपनी  ओलाद
 एक  जीने  का  सहारा  -बे  ओलाद  होने  का  कलंक  तो  न  होता  – माँ  जी  की  पोते  की  जिद  ने  उन्हें
 पोती  से  भी  दूर  कर  दिया  था  |इतना  दूर  की  अब  वो  भी  यही  सोचती  थी की  काश   वो  जिन्दा  होती  उनकी 
अपनी  पोती  “काश  वो  जिन्दा  होती

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Gopalji के द्वारा
March 7, 2011

लाजवाव, उम्दा लेख के लिए शत-शत धन्यवाद

dharmesh rana के द्वारा
February 26, 2011

एक रोचक और सलाहियत प्रदान करने वाली कहानी के प्रस्तुतीकरण पर बधाई | अगली कहानी का इंतजार रहेगा!

    jeetrohann के द्वारा
    February 27, 2011

    प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद ,यदि हम समाज से दहेज़ दानव को ख़त्म कर दे तो इस समस्या का हल हो सकता है

sukhbeer sukhbeer के द्वारा
February 26, 2011

समाज की मानसिकता दर्शाने वाला आपका ये लेख, मर्म को छू लेता है. सार्थक रचना के लिए बधाई की मानसिकता दर्शाने वाला आपका ये लेख, मर्म को छू लेता है. सार्थक रचना के लिए बधाई

    jeetrohann के द्वारा
    February 27, 2011

     sukhbeer ji प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद ,यदि हम समाज से दहेज़ दानव को ख़त्म कर दे तो इस समस्या का हल हो सकता है

sukhbeer sukhbeer के द्वारा
February 26, 2011

देश की वर्तमान दशा पर बखूबी प्रहार किया है आपके इस लेख ने,धन्यवाद!

    jeetrohann के द्वारा
    February 27, 2011

    प्रतिक्रिया दें को धन्य वाद

ashutosh jain के द्वारा
February 26, 2011

हर आदमी आज पैसे का पूत हुआ बैठा है एइसे में किसी से क्या उम्मीद की जा सकती है

    jeetrohann के द्वारा
    February 27, 2011

    प्रतिक्रिया दे के लिए धन्यवाद

kamalkant shukla के द्वारा
February 26, 2011

लघु कथा अपने शीर्षक को सार्थक करती है और पढने वाले के समय की कीमत भी अदा करती है ,अच्छी रचना के लिए बधाई

r c tripathi के द्वारा
February 26, 2011

kahani to badhiya hai pr kush shoti rah gai laagti hai

r d ray के द्वारा
February 26, 2011

बढ़िया सब्जेक्ट चुना है ,आज भ्रूण हत्या हमारे देश में कुश ज्यादा ही बढ गई है यही हल रहा तो १० २० साल बढ बच्चो की शादिया करना मुश्किल हो जाये गा धन्यवाद

shameem rohtagi के द्वारा
February 26, 2011

bohot hi badhia marm pesh kiya hai ,aadmi ki samajh ka fark hai varna beti or bete me koi ntar nahi hai

govind के द्वारा
February 25, 2011

नमस्कार,बहुत ही गहराई से कुछ अहम् बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है आपने इस लेख के जरिये,धन्यवाद!

allrounder के द्वारा
February 25, 2011

समाज मैं नासूर की तरह पनपते भ्रूण हत्या के मर्म को उजागर करता आपका ये लेख आज समाज के सामने कई प्रश्न खड़ा करता प्रतीत होता है !

    jeetrohann के द्वारा
    February 25, 2011

    भाई जी,प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद ,यदि हम समाज से दहेज़ दानव को ख़त्म कर दे तो इस समस्या का हल हो सकता है

RajniThakur के द्वारा
February 25, 2011

rohan ji, marmik kahani jo samaj ke niyam par prahar karte hain.

    jeetrohann के द्वारा
    February 25, 2011

    रानी जी रचना पढने व् टिप्पणी देने हेतु धन्यवाद ,हम कलम के माध्यम से समाज को अगर कोई सन्देश दे सके तो लिखना सार्थक लगने लगता है लेकिन काश बुधजिवी वर्ग व् समाज सुधारक अखबारों व् ज़ल्सों आदि में बयान,भाषण देने के साथ साथ समाज सुधर की कोशिश खुद अपने आप से भी कर सके तो ज्यादा तर सामाजिक कुरीतिय स्वतः ही समाप्त हो जाएँ

rajkishor के द्वारा
February 25, 2011

अच्छे विषय से हमें रूबरू कराने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया

simran kaur के द्वारा
February 25, 2011

क्या लड़की के बिना परिवार चल सकते है ?, bahut hi basawal uthaya hai jis par ham sabhi ko khas kar yuva varg ko gambhirta se sochna chahiye

jagdeesh arora jain muni के द्वारा
February 25, 2011

समाज की  हकीकत को बयां करती  सराहनीय प्रस्‍तुति है

jaspalraj के द्वारा
February 25, 2011

बहुत अच्छा है, कोशिश करते रहिये शुभकामनायें

archna deshpanday के द्वारा
February 25, 2011

अच्छी पोस्ट , शीर्षक को सार्थक करती रचना बधाई

atul rahi के द्वारा
February 25, 2011

badhiya rachana dene ke liye dhanvad


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