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गहरी लकीरें

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वो तनहा बैठी ज़मीन पर
  खीचती है कुछ लकीरें ,मिटा देती है
  शायद  वो समझती है मिट जाएँगी
  इन लकीरों को मिटाने से
  उसकी दुःख तख्लिफें
          पर नहीं
ये वहम है उस का
वो फिर वही कोशिश करती है
नहीं थकती
न धूप ही उसे विचलित कर सकी
न तेज हवाएं , न आंधियां
वो मगन है अपने आप में
नहीं भटकती
शायद उसका
भूत ,भविष्य ,वर्तमान
इन्ही लकीरों में सिमट आया है
ओर वो इन तीनो को
मिटा देना चाहती है
पर लकीरें है कि
इतनी गहरी हो चुकी है
उसकी अपनी कोशिशो से
अब नहीं मिटती
   नहीं मिटती
   गहरी लकीरें !!!!

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

संदीप कौशिक के द्वारा
April 23, 2011

कई लकीरें वास्तव में बहुत “गहरी” हो जाती हैं मलकीत जी | एक जीवटता से परिपूर्ण रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई !! :)

sukhbeer sukhbeer के द्वारा
February 21, 2011

वधिया कविता है बाई जी आप जी डा होम tawun kehda hai

ashutosh jain के द्वारा
February 21, 2011

bhai ji aapki aapni kavita hai ya kahi se maar di ha ha ha ……… naraj na huna ji majak kar rha tha vase badhia likhte ho

simran kaur के द्वारा
February 21, 2011

ब्यूटीफुल पोइम है वीर जी कोंग्रेचुलेशं

rajkishor के द्वारा
February 21, 2011

ऐसी रचनाए कभी कभी देखने को मिलती है ,बधाई

Harish Bhatt के द्वारा
February 21, 2011

जीत रोहन जी सादर प्रणाम, बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई.

    jeetrohann के द्वारा
    February 21, 2011

    आपका आशीर्वाद बना रहे कोशिश करुगा हमेशा अच्छा लिखूं आपका मलकीत सिंह “जीत”

RajniThakur के द्वारा
February 21, 2011

जीत रोहन जी, एक अच्छी मुक्तक , सधी हुई प्रस्तुति के साथ..

    jeetrohann के द्वारा
    February 21, 2011

    रानी जी ध्यानाकर्षण के लिए धन्यवाद ,उम्मीद करु गा की आगे घी मार्ग दर्शन करती रहे गी ताकि त्रुटियो को दूर कर सकूँ !

rahulpriyadarshi के द्वारा
February 20, 2011

लकीरें एक बार बन जायें तो फिर मिट नहीं पाती हैं.

    jeetrohann के द्वारा
    February 21, 2011

    अपे जीवन में लकीरे तो राहुल जी हम स्वयं ही बनाते है और जो इन लकीरों को लाँघ जाता है वो शितिज़ पर पहुच जाता है वरना हम उन्ही लकीरों में कैद हो कर रह जाते है

archna deshpanday के द्वारा
February 20, 2011

आदमी कभी कभी आपनी बनाई सीमाओ में ऐसा बंध जाता है की साडी उम्र उन्हें तोड़ नहीं पाता


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