फुर्सत के दिन/fursat ke din

एक प्रयास,"बेटियां बचाने का"में शामिल होइए http://ekprayasbetiyanbachaneka.blogspot.com/

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malkeet singh "jeet"


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माँ की गोद मिली है यारो , मुझको अब सो जाने दो

Posted On: 30 Sep, 2012  
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रक्त दान !!काश ऐसा हो( जागरण फोरम )

Posted On: 4 Jun, 2012  
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Others टेक्नोलोजी टी टी में

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वो तो बस माँ थी

Posted On: 13 May, 2012  
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देवी तो नहीं है मेरी माँ

Posted On: 7 May, 2012  
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मेरे घर आओ चिड़िया रानी

Posted On: 11 Apr, 2012  
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हादसा होते होते बचा

Posted On: 11 Feb, 2012  
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जली रोटियां

Posted On: 16 Jan, 2012  
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बार बार की गलती बेवकूफी कहलाती है !

Posted On: 8 Jan, 2012  
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नहीं चाहिए मुझे बेटियां ?

Posted On: 26 Nov, 2011  
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आज भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखने वाली और केवल 30 वर्ष की आयु में देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर देने वाली "महा वीरांगना" झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जी का 184वां जन्मदिवस है। आइये हम सब मिलकर उन्हें नमन करें और जानें कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य एक वीर नारी के जीवन के बारे में: रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर, 1828 को उत्तर प्रदेश के पवित्र नगर काशी (वाराणसी) में हुआ। इनके पिता श्री मोरोपंत ताम्बे और माता श्रीमती भागीरथीबाई ताम्बे थे, जो मूलतः महाराष्ट्र के थे। इनका जन्म के समय नाम रखा गया "मणिकर्णिका" जो बाद में "मनु" हो गया। चार वर्ष की आयु में माता के देहांत के बाद इनका लालन-पालन इनके नाना जी ने किया जो बिठूर जिले में पेशवा थे। उन्होंने मनु के निर्भीक और शरारती स्वभाव को देख उन्हें "छबीली" नाम दिया। मनु की शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई, जिसमें उन्होंने पुस्तकीय अध्ययन के अतिरिक्त तलवारबाजी, घुड़सवारी और आत्म रक्षा के गुर भी सीखे। 14 वर्ष की आयु में इनका विवाह झाँसी के राजा श्री गंगाधर राव नेवालकर के साथ कर दिया गया और वे मनुबाई से लक्ष्मीबाई हो गयीं। 1851 में इन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम दामोदर राव रखा गया परन्तु दुर्भाग्य से वह पुत्र केवल चार माह की आयु में मृत्यु को प्राप्त हो गया। इसके पश्चात इन्होंने राजा गंगाधर राव के चचेरे भाई के पुत्र आनंद राव को गोद ले लिया और उसका नाम भी दामोदर राव ही रखा। नवम्बर, 1853 में राजा गंगाधर राव का भी देहांत हो गया और वे झांसी की रानी बनी। उसके बाद 1857 गाय की चर्बी वाले कारतूसों की खबर को लेकर मेरठ से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बगावत शुरू हुई तो इसी विद्रोह के चलते बिलकुल शांत झांसी पर अंग्रेजी फौज ने हफ रोज़ की अगुआई में कब्ज़ा कर लिया और यहाँ से रानी लक्ष्मीबाई की भी इस संग्राम में भूमिका प्रारम्भ हो गई। झांसी ने अपने आप को कमजोर अनुभव करते हुए तात्या टोपे से सहायता मांगी और तात्या टोपे ने 20000 सैनिकों के साथ झांसी को अंग्रेजों से बचाने में पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन अंग्रेजों के सामने कुछ न किया जा सका। आखिर में रानी लक्ष्मी बाई ने किला छोड़कर तात्या टोपे के साथ शामिल होने का निर्णय लिया और झाँसी को छोड़ कर अपने कुछ सैनिकों के साथ काल्पी चली गयी। 22 मई, 1958 को अंग्रेजों ने काल्पी पर आक्रमण कर दिया और दुर्भाग्य से वहां भी रानी को हार का सामना करना पड़ा। उसके बाद रानी लक्ष्मी बाई, तांत्या टोपे, बाँदा के नवाब और राव साहेब वहां से ग्वालियर चले गए और ग्वालियर के किले में रह कर मुकाबला करने की रणनीति बनाई। अंग्रेज 16 जून, 1858 को ग्वालियर पहुंचे और एक बार फिर उन्होंने भारतीय सेना पर सफल आक्रमण किया। इस बार रानी ने फिर बहादुरी से अंग्रेजी आक्रान्ताओं का सामना किया। 18 जून को ग्वालियर के फूल बाग़ के नजदीक कोटा सराय नाम की जगह पर हमलावरों से घिर चुकी रानी घोड़े से गिर गयी, लेकिन फिर भी अंग्रेजी सैनिकों का डट कर मुकाबला करती रही। अंत में बुरी तरह पस्त हो चुकी "महा वीरांगना" ने प्राण त्याग दिए।

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आदरनीय ,मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था ,बस शब्दों के माध्यम से ये सन्देश देने की कोशिश थी की जो दुःख हम सह चुके होते है दुसरो का वो दुःख हम आसानी से समझ सकते है परन्तु अकसर हम उस अवसर का सदुपयोग न कर के दुरउपयोग कर जाते है सास बहु तो इस सन्देश के पत्र मात्र है ऐसा ही कुछ बेटे बेटियों के रिश्ते करने में भी तो हो रहा है जहाँ अक्सर ये सोच हावी हो जाती है की मेरे दामाद ने दहेज़ में मोटर साईकिल मागी है बहु के मायके से मेरे बेटे को भी कार नहीं तो मोटर साईकिल तो माग ही लेनी चाहिए ,कान का कान तो मिले ही और एक बात और के घर के माहौल को खुश नुमा बनाने के लिए जहाँ सास बहु को एक दुसरे की पीड़ा समझने की जरुरत है वही पुरुष वर्ग को भी यदि कहीं कलह का विषय है मूकदर्शक न बन कर एक मध्यस्थ की भूमिका में होना चाहिए

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गयादीन अब भी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था अकेला लाठी के सहारे |एक कंक्रीट के जंगल में ………….. प्रिय मलकीत भाई सुन्दर भाव व्यंग्य भरा अब हमारे जंगल हमारे मानव सच बुत बन गए हैं जान नहीं रही हाथ बढ़ने में आगे आने में सब डरते हैं काश उस भीड़ के सब व्यक्तियों के हाथ में एक एक पत्थर लाठी डंडा और बहुत कुछ होता तो फिर इंसाफ के लिए हमें दर बदर भटकना नहीं पड़ता बधाई हो सार्थक लेख दिल को छू लेने वाला एक सुझाव है लेख लिखने के बाद थोडा दुबारा पढ़ लिया करें बहुत से शब्द हिंगलिश के कारण गलत हो जाते हैं हो गए हैं आप के लेख में भी कृपया एडिट कर दिया करें धोखे बाज , लड़ाते हैं ,पाला बदल, हमारी पार्टी ,खूनी , आवाज जयकारों के बीच दब, रोकने में जुटा था-- आप का भ्रमर ५

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मलकीत भाई सार्थक लेख आप का सुन्दर विषय क्यों न हम पूरे मनोयोग से पालें गाय को उसका भर पेट भोजन -बहुत सही विचार आप के लेकिन क्या ये संभव है नहीं शायद आज शहरों में देखिये लोग पैसा कमाते हैं दान तो कर सकते हैं मगर अपने पास उन्हें पाल नहीं सकते जहाँ खुद उनका उनके परिवार का ठिकाना बा-मुश्किल से हो पता है तो गाय बैल तो दूर की बात है और एक बात इस तरह की परिस्थिति में जो पंडा या पुजारी रहते हैं वे बार बार उस बछिया गाय को पकड़ लाते हैं और बार बार गो दक्षिणा कराते रहते हैं कभी कभी तो कोई गो शाला भी रहती है उसमे रखे रहते हैं सड़कों पर तो कितने लोगों के पशु जो पाले रहते हैं छुट कर घूमते दीखते हैं जो भी हो अपवाद हर जगह है पर विषय आप का जायज है धन्यवाद शुक्ल भ्रमर ५

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